रो उठी कलम है आज
लिखते ही नया विवाद
दर्द उठा नया नया
घाव है हरा - भरा
क्या हो गया समाज को
जो रो उठी कलम है आज
मर्ज तो पुराने हैं
ढंग है नया - नया
कयों सोंच है बिगड़ गई
क्या हो गई कमी भला
क्या हो गया समाज को
जो रो उठी कलम है आज
दर्द देखो जा के पीड़ितों का
थम जाएंगी दिल की धड़कने
सिहर जाएगा मन तेरा वहाँ
यह देख कुछ लिखेगा तू
कि क्या हो गया समाज को
जो रो उठी कलम है आज ।
जो रो उठी कलम है आज ।
आज मैं, क्या हूं और कैसा हूं ? यह हमेशा आपने भी जाना और मैनें भी। लेकिन ‘कल’ यानी कि भविष्य को लेकर जब मेरा दिल और दिमाग चिंतित हुआ तो मैनें ब्लाग लिखना शुरू किया। मेरा उद्देश्य मात्र इतना ही रहा कि मैं जो आज लिख रहा हूं वो कल और बेहतर हो और मुझे मेरा आइना दिखा सके। क्योंकि मेरा लिखा हुआ हर ‘कल’ (मेरा ब्लाग) मेरे आज को बेहतर करेगा। इसलिए आप मेरे ‘कल’ से जुड़ें ताकि भविष्य में जब हम मिलें तो मैं आपकी पहचान से वाकिफ रहूं और मेरी पहचान से आप।
Wednesday, April 1, 2015
रो उठी कलम.......
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