Wednesday, April 1, 2015

रो उठी कलम.......

रो उठी कलम है आज
लिखते ही नया विवाद
दर्द  उठा  नया  नया
घाव  है  हरा - भरा
क्या  हो  गया समाज को
जो रो उठी कलम है आज
मर्ज  तो  पुराने  हैं
ढंग  है  नया - नया
कयों सोंच है बिगड़ गई
क्या हो गई कमी भला
क्या  हो  गया समाज को
जो रो उठी कलम है आज
दर्द देखो जा के पीड़ितों का
थम जाएंगी दिल की धड़कने
सिहर  जाएगा  मन तेरा वहाँ
यह  देख  कुछ  लिखेगा तू
कि क्या  हो  गया समाज को
जो रो उठी कलम है आज ।
जो रो उठी कलम है आज ।

No comments:

Post a Comment